गुरु और शिष्या के बीच चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया की कूटनीति पर गहन चर्चा होती है।
गुरुजी, आप राष्ट्रपति शी जिनपिंग की हाल की वियतनाम, मलेशिया और कंबोडिया यात्रा को कैसे देखते हैं? मीडिया कह रही है कि यह साल की पहली उच्चस्तरीय विदेश यात्रा थी और काफी ध्यान आकर्षित कर रही है।
यह यात्रा वास्तव में बहुत महत्वपूर्ण है, खासकर जब राष्ट्रपति शी ने एक बार फिर ‘मित्रता, ईमानदारी, पारस्परिक लाभ और समावेश’ वाली पड़ोसी कूटनीति की अवधारणा को दोहराया। यह दरअसल उस प्राचीन कहावत का आधुनिक रूप है—‘दूर का रिश्तेदार उतना काम का नहीं जितना पास का पड़ोसी।’
हां, मैंने भी ध्यान दिया कि उन्होंने विशेष रूप से कहा कि ‘चीन के विकास की तेज़ रफ्तार ट्रेन में पड़ोसी देशों का स्वागत है।’ यह 'साझी नियति के समुदाय' की कल्पना को भी दर्शाता है। लेकिन आज की जटिल अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों में, क्या आपको लगता है कि इस तरह का सहयोग मॉडल आसानी से जारी रह पाएगा?
समय भले बदल जाए, लेकिन पड़ोसियों के बीच आपसी सहयोग का सिद्धांत नहीं बदलता। इतिहास में चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के बीच हजारों वर्षों से संपर्क रहा है—झेंग हे की समुद्री यात्राओं से लेकर आधुनिक समय की उथल-पुथल तक। आज का ‘खुला क्षेत्रीयवाद’ शांति के समय में एक समझदारी भरा विकल्प है और यह रास्ता और अधिक विस्तृत होता जाएगा।
लेकिन कुछ लोग चिंतित हैं कि वैश्वीकरण में रुकावटें चुनौतियां पैदा कर सकती हैं, जैसे कि 'बेल्ट एंड रोड' परियोजना को कठिनाइयों का सामना करना पड़ सकता है। इस बारे में आप क्या सोचते हैं?
चुनौतियाँ ज़रूर हैं, लेकिन सहयोग की कुंजी है समावेशिता और आपसी विश्वास। ASEAN और चीन के बीच का सहयोग मॉडल पहले ही यह साबित कर चुका है कि खुला क्षेत्रीयवाद तूफानों को झेल सकता है। यह यात्रा निश्चित रूप से सभी पक्षों को सहयोग और साझा लाभ के महत्व को और गहराई से समझाने में मदद करेगी।
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