कई जगहों पर माता-पिता के लिए पालन-पोषण अवकाश लागू किया गया है, लेकिन पुरुषों के आवेदन अक्सर अस्वीकार कर दिए जाते हैं या उन्हें अनुपस्थित माना जाता है।
हुआ, क्या तुमने हाल की खबर देखी? कई जगहों पर पालन-पोषण अवकाश की नीति है, लेकिन लोग कहते हैं कि ‘छुट्टी है पर लेना मुश्किल है।’
देखी। खासकर पुरुषों के लिए तो और भी कठिन है। कुछ कंपनियाँ तो पालन-पोषण अवकाश को गैरहाज़िरी मानती हैं और नौकरी से निकाल भी देती हैं।
हाँ, असल में ये नीति इसलिए बनाई गई थी कि दोनों माता-पिता बच्चों की देखभाल में भाग ले सकें, लेकिन हकीकत में ज़्यादातर दफ़्तर सिर्फ़ माँ की छुट्टी मानते हैं।
ये पारंपरिक सोच का असर है। बहुत लोग मानते हैं कि ‘बच्चों की देखभाल माँ का काम है’, इसलिए पिता के छुट्टी लेने को समझ नहीं पाते।
लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि अगर सिर्फ़ माँ ज़िम्मेदारी उठाएगी तो महिलाओं पर कार्यस्थल का दबाव और बढ़ेगा। पिताओं को अवकाश लेने के लिए प्रोत्साहित करना ही असली समानता है।
मुझे लगता है कंपनियों को लागत की चिंता रहती है। अगर उन्हें पूरी तनख्वाह देनी पड़े, तो वे स्वाभाविक रूप से हिचकते हैं।
इसलिए कुछ लोग सुझाव देते हैं कि मातृत्व बीमा कोष, सरकार और व्यक्ति सभी मिलकर खर्च बाँटें, ताकि कंपनियों के पास कोई बहाना न रहे।
हाँ, नीति को ज़मीन पर उतारने के लिए संस्थागत सुरक्षा और सामाजिक सोच में बदलाव दोनों ज़रूरी हैं। वरना पालन-पोषण अवकाश बस ‘कागज़ी सुविधा’ बनकर रह जाएगा।
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